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सपनों के-से दिन (गुरुदयाल सिंह)

CBSE Class 10 Hindi (Course B) • Sanchayan Part-2

लेखक परिचय: गुरुदयाल सिंह (Gurdial Singh)

गुरुदयाल सिंह पंजाबी भाषा के एक बहुत ही प्रसिद्ध और सम्मानित साहित्यकार थे। उनकी आत्मकथा (Autobiography) का नाम 'न्यारियाँ' है, जिसके एक हिस्से (अंश) को 'सपनों के-से दिन' के रूप में इस पाठ में शामिल किया गया है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में बचपन की आज़ादी, मासूमियत, शिक्षा व्यवस्था में फैली कमियां, और सामान्य बच्चे की छोटी-छोटी ख़ुशियों का बहुत ही मार्मिक और सजीव वर्णन मिलता है।

पाठ का सार और मूल भाव (Theme/Core Message):

यह पाठ लेखक के अपने बचपन की 'मधुर और खट्टी-मीठी यादों' (Nostalgic memories) का ख़ज़ाना है। कहानी में उस दौर (समय) का वर्णन है जब स्कूलों में बच्चों को पढ़ाई का 'डर' दिखाया जाता था और अध्यापकों (शिक्षकों) द्वारा 'मार-पीट और कठोर सज़ा' (Physical punishment) आम बात थी। बच्चे स्कूल जाने से बहुत नफ़रत (डरते) थे, लेकिन छुट्टियों (Holidays) में खेलने-कूदने और 'स्काउटिंग' (Scout Guide) की परेड में खाकी वर्दी पहनकर चलने में उन्हें जो ख़ुशी और 'स्वर्ग जैसा सुख' मिलता था, वही सब मिलकर उनके बचपन को 'सपनों के-से दिन' बनाता था।

कथा का विस्तार और प्रमुख घटनाएँ (Key Events)

1. बचपन का खेल, आज़ादी और चोटें

लेखक बताते हैं कि उनके बचपन में उनके सभी दोस्त लगभग 'एक जैसे' (समान) परिवारों से आते थे। सभी बच्चे मिट्टी में खेलते थे, धूल-मिट्टी में सन जाते थे।
खेलते समय अक्सर गिरकर उनके घुटने छिल जाते थे (चोट लग जाती थी) और पिनडलियों (घाव) से खून बहने लगता था। लेकिन 'चोट के दर्द' से ज्यादा उन्हें इस बात का डर होता था कि घर जाकर उन्हें माता-पिता से 'गहरी मार' (पिटाई) पड़ेगी
मज़ेदार बात यह थी कि जब पिता या माँ उन चोटिल बच्चों को और अधिक पीटते थे, तब भी 'अगले दिन' वे सब कुछ भूलकर फिर से उसी मिट्टी में खेलने पहुँच जाते थे। यह बच्चों के बचपन की असीम 'आज़ादी और मासूमियत' का प्रतीक है।

2. स्कूल और अध्यापकों का डर (Harsh reality of School)

उन दिनों (लेखक के समय) स्कूल बच्चों के लिए एक 'भयानक जगह' (डरावनी) हुआ करती थी। पढ़ाई के नाम पर रट्टा मारना और गुरुओं (टीचर्स) की 'क्रूर मार' खाना आम बात थी।
अधिकांश बच्चों का मन 'पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता था'। बहुत से बच्चों के माता-पिता उनका स्कूल जाना छुड़वा देते थे क्योंकि वे सोचते थे कि 'पढ़-लिखकर भी क्या करना है, अंत में खेती, दुकानदारी या बही-खाते का काम ही तो सँभालना है।'
बस्ते (स्कूल बैग) का भारी बोझ, फटी पुरानी किताबें (जो अक्सर पुरानी कक्षा के लड़कों से आधे दाम पर मिलती थीं), और उनसे आने वाली 'सीलन की अजीब सी महक' लेखकों और उनके दोस्तों का मन भारी कर देती थी।

3. 'पी.टी. सर' प्रीतम चंद का ख़ौफ़ और दहशत (The Strict PT Master)

स्कूल में पी.टी. मास्टर 'श्री प्रीतम चंद जी' (PT Master Pritam Chand) का बच्चों में बहुत अधिक डर या दहशत (Terror) था। उनका स्वरूप ही बहुत डरावना था: छोटे क़द (Small height), गठीला शरीर, माता (Cheekpox) के दाग़ों से भरा हुआ चेहरा और बाज़ जैसी तेज़ आँखें।
वे बच्चों को 'कठोर और अमानवीय सज़ा' देते थे। अगर कोई बच्चा परेड में या पी.टी. में थोड़ी सी भी गलती करता, तो वे उसे 'मुर्गा' (Rooster punishment) बना देते या उसकी खाल उधेड़ देने की धमकी देते थे। उनका एक डंडा था जिससे वे बच्चों को बेरहमी से मारते (पिटाई करते) थे। बच्चों के मन में उनका इतना ख़ौफ़ था कि बच्चे उन्हें देखते ही थर-थर काँपने लगते थे।

4. हेडमास्टर मदन मोहन शर्मा का नरम स्वभाव

पी.टी. मास्टर के बिल्कुल विपरीत स्कूल के हेडमास्टर 'श्री मदन मोहन शर्मा जी' (Headmaster Madan Mohan Sharma) का स्वभाव बहुत ही 'नरम और प्यार करने वाला' (Gentle & soft) था।
वे बच्चों को कभी मारते-पीटते नहीं थे। अगर उन्हें गुस्सा भी आता था, तो वे सिर्फ़ "लड़के! यह क्या किया तुमने?" कहकर उन्हें मुस्कुराते हुए माफ़ कर देते थे। लेखक और सभी बच्चे हेडमास्टर जी का बहुत सम्मान करते थे और उनसे बिल्कुल नहीं डरते थे।

5. 'स्काउटिंग की परेड' और स्वर्ग की ख़ुशी (The Joy of Scouting)

स्कूल में 'स्काउटिंग' (Scouts and Guides) एक ऐसा समय था जब बच्चों को स्कूल जाने में 'स्वर्ग जैसी ख़ुशी' (Heavenly Joy) का अहसास होता था।
लेखक बताते हैं कि जब बच्चे 'खाकी वर्दी' (Khaki Uniform), गले में पीले-नीले रंग का 'रुमाल' (Scarf) और पैरों में 'कैनवास के भारी जूते' (Canvas shoes) पहनकर परेड करते थे, तो उन्हें लगता था जैसे वे 'सच्चे फौजी' (Army soldiers) बन गए हैं।
पी.टी. सर (प्रीतम चंद जी) इसी वर्दी को पहनकर जब बच्चों को 'लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट' (Left-Right) और 'अबाउट-टर्न' कहकर मार्च-पास्ट कराते थे, और जब कदम-ताल करते हुए सारे बच्चों के बूट एक साथ बजते थे, तो लेखक को 'गर्व (Pride) और बहुत बड़ी ख़ुशी' की अनुभूति होती थी। यही वह एकमात्र चीज़ थी जो उन्हें स्कूल से जोड़कर रखती थी।

6. 'छुटियों का काम' और बच्चों का डर (Holiday Homework)

ज़्यादातर बच्चों (लेखक और उनके दोस्तों) को 'गर्मियों की छुट्टियाँ' (Summer Holidays) बहुत प्यारी लगती थीं। वे पहले तीन-चार हफ़्ते तो नानी के घर जाकर, तालाबों में नहाकर और खेलकर मस्ती से बिता देते थे।
लेकिन जब 'छुट्टियों का काम' (Holiday Homework) जमा करने का समय (आखिरी एक-दो हफ़्ते) पास आता था, तो उनकी हवाइयां उड़ जाती थीं (वे बहुत घबरा जाते थे)।
लेखक का एक दोस्त 'ओमा' (Oma) था, जो बहुत शरारती था। जब मास्टरों द्वारा दिए गए गणित (Maths) के मुश्किल सवालों को देखकर बच्चे डर जाते थे, तो ओमा जैसे निडर लड़के होमवर्क करने के बजाय 'मास्टरों की मार खाना' अधिक आसान और बेहतर समझते थे। वे कहते थे कि "पढ़ाई कौन करेगा, इससे अच्छा तो 10 डंडे खा लेंगे।" यह बच्चों की उस मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है जहाँ 'काम के डर' से 'मार का डर' कमज़ोर पड़ जाता था।

7. पी.टी. मास्टर (प्रीतम चंद) का 'मुअत्तल' (Suspension) होना

एक बार कक्षा चार (Class 4) में पारसी (Persian / Farsi) भाषा पढ़ाते समय पी.टी. सर 'प्रीतम चंद' को बहुत गुस्सा आ गया था। उन्होंने बच्चों को 'मुर्गा' बना दिया था (बच्चों से कान पकड़वा कर पीठ पर डंडे रखना)।
तभी वहाँ से नरम स्वभाव वाले और परोपकारी 'हेडमास्टर मदन मोहन शर्मा जी' गुज़रे। बच्चों की ऐसी दुर्दशा देखकर उनसे रहा नहीं गया।
उन्हें पी.टी. सर पर बहुत गुस्सा आया और उन्होंने कहा, "क्या चौथी कक्षा के छोटे बच्चों को ऐसी अमानवीय सज़ा देना कोई इंसानियत है?"
उन्होंने तुरंत एक्शन लिया और पी.टी. सर को स्कूल से 'मुअत्तल' (Suspend / बर्खास्त) कर दिया। यह घटना बताती है कि हेडमास्टर जी बच्चों से कितना प्यार करते थे और वे 'शिक्षा में मार-पीट और हिंसा' के सख्त खिलाफ़ थे।

8. 'सख़्त' पी.टी. मास्टर का 'नरम' पहलू (The Soft side of PT Sir)

मुअत्तल (Suspended) होने के बाद पी.टी. सर अपने घर (क्वार्टर) में रहने लगे थे। सभी बच्चे बहुत खुश थे और हैरान भी थे।
लेकिन लेखक ने पी.टी. सर का एक बहुत ही 'अलग और नरम पहलू' देखा।
पी.टी. सर ने अपने घर में 'तोते' (Parrots) पाल रखे थे। जो इंसान बच्चों पर डंडे बरसाता था, वही इंसान उन प्यारे तोतों को बहुत प्यार से बातें करते हुए बादाम की छिरी हुई 'गिरियाँ' (Almonds) खिलाता था। यह देखकर बच्चों को बहुत आश्चर्य हुआ कि एक कठोर और निर्दयी इंसान के अंदर भी 'प्यार और दया' (Love and Kindness) का एक हिस्सा छिपा हो सकता है।

प्रमुख पात्रों का चरित्र-चित्रण (Character Analysis)

1. हेडमास्टर मदन मोहन शर्मा: वे बहुत ही शांत (Cool-headed), दयालु (Kind) और बच्चों से प्यार करने वाले शिक्षक थे। वे कभी बच्चों को नहीं मारते थे। वे 'सहानुभूति' में विश्वास करते थे और 'मार-पीट' वाली शिक्षा-प्रणाली के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने पी.टी. सर को उनकी क्रूरता के कारण तुरंत सस्पेंड कर दिया था, जो उनके 'न्यायप्रिय' स्वभाव को दर्शाता है।

2. पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद (PT Master): वे बहुत ही कठोर (Strict), निर्दयी और अनुशासन-प्रिय (Disciplinarian) इंसान थे। उनका डरावना चेहरा और डंडा बच्चों के मन में दहशत पैदा करता था। लेकिन उनके चरित्र का दूसरा पहलू यह भी था कि उन्हें 'स्काउटिंग परेड' से बहुत प्यार था और वे अपने 'तोतों' (Pets) से भी बहुत अधिक प्यार करते थे, जो उनके अंदर की 'कोमलता' को दर्शाता है। वे केवल काम (नौकरी) के मामले में सख़्त थे।

3. लेखक (बचपन में): बचपन में लेखक और उसके दोस्त बहुत मासूम (Innocent), आज़ाद ख्याल और खेलने के शौकीन थे। उनके लिए 'खुली हवा में खेलना और चोट खाना' स्कूल की चारदीवारी से बेहतर था। उन्हें सिर्फ़ 'स्काउटिंग' की वर्दी और परेड से ख़ुशी मिलती थी। यह दर्शाता है कि बच्चों का मन 'स्वतंत्रता और खेल-कूद' में सबसे ज़्यादा लगता है, बोझिल पढ़ाई में नहीं।

BOARD EXAM QUESTIONS

प्रश्न 1: पाठ के आधार पर बताइए कि बच्चों को स्कूल जाना क्यों पसंद नहीं था और फिर भी वे स्कूल की किस गतिविधि (activity) से आकर्षित होते थे?

उत्तर: 'सपनों के-से दिन' पाठ के अनुसार, बच्चों को स्कूल जाना बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि उन दिनों 'पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद' और अन्य शिक्षकों का बहुत ज़्यादा आतंक और डर था। शिक्षक अमानवीय रूप से मार-पीट करते (जैसे 'मुर्गा' बनाना) और रटंत-पढ़ाई पर ज़ोर देते थे।
हालाँकि, बच्चे स्कूल की 'स्काउटिंग (Scout and Guide) और परेड' की गतिविधि से सबसे अधिक आकर्षित होते थे। जब वे खाकी वर्दी, गले में रुमाल और कैनवास के जूते पहनकर पी.टी. सर के नेतृत्व में कदम-ताल (Left-Right) और मार्च-पास्ट करते थे, तो उन्हें 'फौजी सैनिक' होने का अहसास होता था और यह उन्हें 'स्वर्ग जैसी ख़ुशी और गर्व' का अनुभव कराता था।


प्रश्न 2: हेडमास्टर 'मदन मोहन शर्मा' और पी.टी. मास्टर 'प्रीतम चंद' के स्वभाव में क्या अंतर था? एक उदाहरण देकर स्पष्ट करें।

उत्तर: हेडमास्टर शर्मा जी और पी.टी. सर का स्वभाव एक-दूसरे से बिल्कुल उल्टा था:
1. हेडमास्टर मदन मोहन शर्मा: वे बहुत ही शांत, दयालु और बच्चों से प्यार करने वाले इंसान थे। वे मार-पीट के सख्त खिलाफ थे।
2. पी.टी. मास्टर प्रीतम चंद: वे बहुत सख़्त, निर्दयी और खूंखार स्वभाव के थे। वे छोटी-सी गलती पर भी खाल उधेड़ देने वाली सज़ा (जैसे मुर्गा बनाना) देते थे और सभी उनसे डरते थे।
उदाहरण: जब पी.टी. सर ने चौथी कक्षा के छोटे बच्चों को 'मुर्गा' बनाकर बहुत कठोर सज़ा दी, तो हेडमास्टर शर्मा जी से यह क्रूरता देखी नहीं गई और उन्होंने तुरंत पी.टी. सर को 'मुअत्तल' (Suspend) कर दिया। यह घटना दोनों के बीच के वैचारिक अंतर (Ideological difference) को साफ़ दिखाती है।


प्रश्न 3: बचपन की स्मृतियों (Memories) में लेखक ने क्या बताया है कि खेलते समय चोट लगने पर भी बच्चे अगले दिन वापस क्यों खेलने आ जाते थे?

उत्तर: बचपन की স্মृतियों में लेखक बताते हैं कि सभी बच्चे धूल-मिट्टी में खेलते थे और अक्सर गिरकर उनके घुटने छिल जाते थे (चोट आ जाती थी)।
चोट से ज़्यादा उन्हें यह 'डर' होता था कि घर जाकर माता-पिता से 'गहरी मार' (पिटाई) पड़ेगी। लेकिन भले ही वे घर पर बहुत पिटते थे, फिर भी बचपन की आज़ादी, खेल का नशा, और दोस्तों का साथ (मासूमियत) इतना प्यारा होता था कि बच्चे 'सारी मार और दर्द भूलकर' अगले दिन सुबह फिर से उसी धूल-मिट्टी में खेलने के लिए आ जाते थे। यह बाल-मनोविज्ञान का बहुत सुंदर चित्रण है।


प्रश्न 4: ओमा जैसे लड़के 'गर्मियों की छुट्टियों' में पढ़ाई के काम के प्रति कैसा नज़रिया रखते थे?

उत्तर: ओमा जैसे शरारती और निडर लड़के 'गर्मियों की छुट्टियों' के होमवर्क (Holiday homework) को बिल्कुल भी महत्व (Importance) नहीं देते थे।
गणित (Maths) जैसे कठिन विषयों के 50-60 सवाल रोज़ करने के बजाय, ओमा का मानना था कि "इतनी माथापच्ची करने (मेहनत करने) से अच्छा है कि स्कूल खुलने पर अध्यापकों के 10-15 डंडे खा लिए जाएँ।" ओमा को 'काम का डर' शिक्षकों की 'मार के डर' से भी ज़्यादा बड़ा और उबाऊ (Boring) लगता था। इसलिए वह सारा समय सिर्फ खेलने और मस्ती करने में ही बिता देता था।